मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

हॉलैंड में आयोजित होगा अगला अंतर्राष्ट्रीय भोजपुरी महासम्मेलन

दोस्तों ...........भारतीय भूमि की एक गरिमामयी भाषा भोजपुरी जिसकी उपेक्षा भारतीयों द्बारा ही सबसे ज्यादा हो रही है , को विदेशों में विशेष महत्त्व मिल रहा है ! विदित है की अभी हाल ही में भोजपुरी का एक अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन मारीशस में सफलता पूर्वक आयोजित किया गया था जिसमे वहां के राष्ट्रपति अनिरुध्ध जगन्नाथ एवं प्रधानमन्त्री नवीन रामचंद्र गुलाम के साथ साथ पूर्व स्वास्थ्य मंत्री जगदीश गोवेर्धन का विशेष सहयोग रहा ! कार्यक्रम में दुनिया के 25 देशों के 300 उच्च स्तरीय प्रतिनिधि भाग लिए ! उसी कार्यक्रम में भोजपुरी का अगला अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन को हॉलैंड में कराने का प्रस्ताव भी रखा गया और विशेष बात यह है की यह प्रस्ताव स्वयं हॉलैंड सरकार की तरफ से आये प्रतिनिधियों ने रखा ! चार साल के अंतराल पर होने वाले भोजपुरी के इस महासंगम का 2013 में हॉलैंड में होना तय हो चुका है !
निश्चित ही यह भारत एवं भोजपुरिया लोगों के लिए गौरव की बात है परन्तु दुःख इस बात का है कि जब दुनिया के तमाम देश भोजपुरी को इतना महत्त्व दे रहे हैं तो भारत सरकार का इस भाषा से क्यों मोहभंग हो चुका है ?

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

राष्ट्रवाद के प्रतीक थे गाँधी ....................

जय हिंद जय भारत.........................



जब लगा देखने मानचित्र भारत न मिला तुझको पाया ,



जब देखा तेरी आँखों में भारत का चित्र उतर आया !!



दोस्तों .....................भारतीय इतिहास को गौरवान्वित करने वाले उन्नीसवी सदी के जाज्वल्यमान नक्षत्र, अहिंसा के पुजारी , सत्यवादिता के समर्थक ,राष्ट्रवाद के प्रतिमूर्ति ,प्रेम के पर्याय एवं हिंदी के युगाधार महात्मा गाँधी का नाम विश्व इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में जवाहराती अक्षरों में अंकित है ! अगर आज 2 अक्टूबर को हम बापू के जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं तो यह तथ्य भी वर्णनीय है की यह गरिमामयी तिथी रूस में अहिंसा दिवस के रूप में मनायी जाती है ! महात्मा गाँधी का संघर्ष स्थूल नहीं था ! उनके संघर्षों में स्थूलता के नहीं वरन सूक्ष्मता के दर्शन होते हैं ! उनकी लड़ाई देश , जाति ,धर्म , समाज ,रंग - भेद आदि जैसे संकुचित मुद्दों पे नहीं वरन समस्त मानव मात्र के कल्याण हेतु थी ! वो जड़ों के विरोध में लड़े ना की ताने और पत्तियों के विरोध में , वो बुराई के विरोध में आवाज़ उठाये न कि बुरे व्यक्ति के ! महात्मा गांधी का हिंदी संरक्षण के लिए संघर्ष स्वाभाविक था क्योंकि उनको डर था कि कहीं आने वाले समय में हिंदी को हिन्दुस्तान में ही अंग्रेजी सीखने कि नौबत ना आ जाय और गाँधी का पाला वो डर आज काफी हद तक दिख भी रहा है ! खैर जो भी हो भारतीय माटी के उस अद्वितीय पुरुष को मेरा सलाम ....................

                                                                                             शिवानन्द द्विवेदी "सहर"





आंसू छलके ना किसी के , गम हटा दो जिन्दगी से


दौलतों से सुख न मिलता दिल मिला लो हर किसी से


बोलो वो ही जो सही हो झूठ से नाता नहीं हो


दौर तो आते कई हैं पर न हिम्मत कि कमी हो


बस यही चाहत हमारी ये जहां फिर से हंसीं हो ...........ये जहां फिर से हंसीं हो