आज के दौर में सुसुप्त पड़ा एक ऐसा मुद्दा है जो किसी ज्वलंत मुद्दे से कम नहीं प्रतीत होता है ! सवाल ये उठता है कि हिंदी के सन्दर्भ में महात्मा गाँधी ने जो परिकल्पना कि थी क्या हिंदी उस परिकल्पना के समकक्ष खड़ी परिलक्षित हो रही है ? क्या अपनी ही जन्मभूमि पर हिंदी कि उपेक्षा नहीं हो रही है ? आज के दौर में रोजगार का हवाला देकर क्या हम और हमारी सरकार हिंदी से मोहभंग नहीं कर रही है ? आंकडों पर गौर करे तो दुनिया के १४० देश जिसमे चीन , जापान एवं समस्त यूरोपीय देश अपनी भाषा में ही रोजगार एवं तकनीक विकसित कर रहे हैं तो फिर ये कमी किसकी है हमारी हिंदी हमारे देश में संवैधानिक सिद्धांत बन कर रह गयी है ! आज के दौर में हिंदी की दुर्दशा पर क्या हमें और हमारी सरकार को सोचने की जरुरत नहीं है ? हम यह आवाज अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हिंदी के पक्ष में उठा रहे हैं , क्या आपको नहीं लगता कि हिंदी अनिवार्य एवं अंग्रेजी वैकल्पिक कि जगह अंग्रेजी अनिवार्य एवं हिंदी वैकल्पिक कि स्थिति भारतीय महानगरों में उत्पन्न हो रही है ? अगर इस पर समय रहते नहीं सोचा गया तो शायद हम सरकार के नहीं लेकिन संस्कृति के ,कानून के नहीं लेकिन भाषा के गुलाम बन जायेंगे !
मै यह निमंत्रण किसी प्रकार के दोस्ती एवं मनोरंजन के लिए नहीं प्रेषित कर रहा हूँ , मै एक ज्वलंत मुद्दा प्रेषित कर रहा हूँ जिस पर विचार कि जरुरत है ! आप इसे स्वीकार करके शिवा "सहर " से नहीं जुड़ रहे बल्कि अपने राष्ट्र एवं उसकी पहचान से जुड़ रहें है !यह निमत्रण मै सबको भेज रहा हूँ चाहें उसे मै जानता हूँ या नहीं , चाहें वो मेरा अजीज है या दुश्मन क्योंकि यहाँ सवाल मेरे संबंधों का नहीं राष्ट्र के मुद्दे का है ! ..............................
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें